Saturday, November 16, 2019

सुबह शाम की मेहनत के साथ स्कूल की पढ़ाई भी मन लगाकर करता था।

मैं उस मनोहर की बात कर रहा हूं जो कभी यहां चाय के ठेले पर काम करता था। 

यह सुनकर युवक की आंखें चमक उठी बाबूजी कहीं आप वह तो नहीं जो वर्षों पहले यहां चाय पीने आते थे हां तुमने ठीक पहचाना तुम ही हो वह मनोहर। मनोहर ने झुककर मेरे पैर छू लिए मेरे लिए समझने को इतना ही प्रयोग था बचपन के मनोहर की विनम्रता आज और भी घनीभूत ही हो गई थी।
मुझे बीते समय की याद आने लगी तब मनोहर चाय की दुकान पर काम करता था गजब की फुर्ती थी

उसमें इस कार्य को करने के लिए किसी की बाध्यता नहीं थी। 

सुबह शाम की मेहनत के साथ स्कूल की पढ़ाई भी मन लगाकर करता था चाय की दुकान पर मेहनत से कमाया उसका पैसा स्कूल की फीस मैं चला जाता था बातों ही बातों में 1 दिन उसकी राम कहानी सुनने का अवसर मिला था उसने बताया था मैं अपने घर से भागकर यहां आया हूं यह पूछने पर कि तुम घर से क्यों भाग्य मनोहर ने जो कुछ बताया था वह एक अमिट छाप की तरह मेरे हृदय में अंकित हो गया।

बाबूजी अब उस घर में मेरा क्या रह गया था जो मैं वहां रहता तुम कहां के रहने 

वाले हो राजस्थान में डूंगरपुर के पास एक छोटे से गांव का तुम्हारा माता पिता कहां है एक माही तो थी मर गई कब कैसे बाबूजी तब मैं कोई 2 वर्ष का था बड़ी प्यारी थी मेरी मां बहुत प्यार करती थी मुझे।
बीमार हो गई थी बेचारी दवा के पैसे नहीं थे मेरे पास बस बिना किसी दवाई के लिए एक दिन मुझे छोड़ कर चली गई।
आज युवक मनोहर को देखकर मुझे बचपन का वह मनोहर याद आ गया जो मां की बात करते हुए फूट-फूटकर रो पड़ा था।

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