Friday, November 15, 2019

गो सरंक्षण से ग्राम विकास।

अपने ऋषि-मुनियों ने गहन चिंतन के बाद यह उद्घोष किया है। 

भारतवर्ष में सदियों से गाय धन और धन्य की दात्री अन्नदाता एवं उपयोगी पशु पत्र ही नहीं वरना यहां के लोग उस पवित्र और पूज्य मानकर अत्यंत आस्था का भाव रखते हैं।
गोदन के प्रति आदर भाव हमारी पुरातन संस्कृति का अटूट हिस्सा रहा है दवा पर काले में गोपाल नाम से विख्यात यदुकुल तिलक श्रीकृष्ण स्वयं ग्वाला बनकर गौ सेवा करते दृष्टिगोचर होते हैं तो मध्यकाल में हम अकबर के राज्य काल में गौ रक्षक की बहुत अच्छी व्यवस्था का उल्लेख दिखाई देते हैं।

भारतीय जन जीवन में गाय का अपना विशेष महत्व है। 

गाय चौपाइयां प्राणी है और उसे मां के बराबर आदर दिया गया है आई है हमारी पारिवारिक व कृषि संस्कृति की आधार रही है गाय को गोदन कहां है पौराणिक काल में जिसके पास जितनी अधिक गाए हुए उतना ही धनी माना जाता था।
पत्ते एवं गायों की सुरक्षा को एक मानवीय कर्तव्य के रूप में परिभाषित किया गया है गाय को वेदों में दक्षिणी सुरक्षा के योग्य इसी अर्थ में स्वीकारा गया है कि वह शुरू अपरदन है गायों के जेब बलों ने कृषि कार्य में इतना सहयोग किया कि वह गायों के साथ ही पूजा के योग्य भी माने गए हैं।
मौर्य सम्राट अशोक ने अपने स्तंभों पर सूर्य और अश्विन के साथ ही बैलों का अंकल भी करवाया यह बल्कि शक्ति के महत्व का परिचय है।

बेल को बली वध और वृषभ भी कहा जाता है और वह शिव भगवान की सवारी है। 

गोदन के महत्व को स्वीकार कर श्रीकृष्ण ने लोगों को उसके पालन-पोषण की सीख दी महाराजा दिलीप ने जीवन में गौ सेवा को महत्व दिया उन्होंने नंदिनी गाय की सेवा से जीवन को सार्थक किया ऋषि वशिष्ठ द्वारा कामधेनु गाय की रक्षा की कहानी रामायण में आई है इस प्रकार गो सरंक्षण में ग्राम का भी विकास है।

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