Friday, October 4, 2019

मेहनत रंग लाई एक छोटा सा गांव था।

गांव का नाम रामपुर था यहां गांव चार और पहाड़ियों के बीच बसा था।

पास में एक नदी बेटी थी वर्षा के दिनों में जब नदी उफन थी तब रामपुरा का संपर्क उस पार के गांव से टूट जाता बाढ़ में कभी कोई आदमी बह जाता।
कभी कोई बच्चा हजारों जानवर का पता तक नहीं लगता बाढ़ इतनी उत्तरण पर चारों और कीचड़ की कीचड़ हो जाता जिससे गांव वालों की गाड़ियां फंस जाती इस प्रकार महीनों रामपुरा का संपर्क पार के गांव से टूट जाता है यह दुख सभी का था किंतु कोई भी कुछ नहीं कर पाता।

गांव का ही एक छात्र इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करके वहां आया हुआ था।

उसने समझाया कि इस मुसीबत से छुटकारा तो पुल बनाने पर ही मिल सकता है इस सुझाव से सारे गांव वाले सहमत हो गए युवकों ने कहा कि विपुल के लिए प्रतिदिन 2 घंटे काम करेंगे सावित्री बहन नहीं स्त्रियों की ओर से विश्वास दिलाया कि वह भी अपने भाइयों से पूछे नहीं रहेगी।
ठेकेदार ने चुना मिट्टी और पत्थर लाने के लिए अपनी गाड़ी देने का वचन दिया विद्यार्थियों ने कहा कि वे टोलियां बनाकर नियमित श्रमदान करेंगे बस फिर क्या था पुल बनना शुरू हो गया।

पासी की पार्टी से बैलगाड़ी पत्र ला रही थी गधे वाले बिना पैसे रेतला रहे थे पानी तो नदी ही कथा ही।

गांव के युवक युवतियां और छात्र सभी पुल के निर्माण में हाथ बंटा रहे थे सारा गांव एक लक्ष्य से जुड़ गया था थोड़े ही दिनों में पुल के खंबे दिखाई देने लगे गांव के लोगों ने सरकारी अधिकारियों तक भी अपनी बात पहुंचाई उनकी भी खुली हुई उन्होंने फूल के लिए आर्थिक सहायता के लिए एक अधिकारी भेज दिया एक बार काम शुरू हुआ तो फूल बन कर ही लोगों ने दम लिया।

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