Sunday, October 27, 2019

महतो ने सुभागी के माता-पिता को समझाया।

मगर शाहिद महतो को यह सुख बहुत दिनों तक बोगना ने लिखा था। 

सात आठ दिन से महत्व को बहुत तेज बुखार हुआ है लक्ष्मी पास बेटी रो रही है अभी एक्शन पहले महतो ने पानी मांगा था पर जब तक वह पानी लाई तब तक उनके हाथ-पांव ठंडे हो गई है सुबह कि उनकी यह दशा देखते ही रामू के घर गई और बोली भैया चलो देखो आज दादा ने जान कैसे हुआ आता है सात दिन से बुखार नहीं उतरा।
रामू ने चारपाई पर लेटे लेटे का तो क्या मैं डॉक्टर हकीम हूं कि देखने चलूं जब तक अच्छे थे।

 तब तक तो तुम उनके गले का हार बनी हुई थी आज जब मरने लगे तो मुझे बुलाई है। 

सुभागी ने फिर उससे कुछ नहीं कसीदे सज्जन सिंह के पास गई उधर सज्जन सिंह ने जूही महत्व की हालत के बारे में सुना तुरंत सुबह की के साथ भागे चले आए वहां पहुंचते ही महतो की दशा और खराब हो चुकी थी नाड़ी देखी तो बहुत धीमी थी समझ गई कि जिंदगी के दिन पूरे हो गए महतो जैसे नींद से जाग कर बोले बहुत अच्छी है भैया अब तो चलने की बेला है सुबह की के पिता अब तुम्हें हो उसे तुम ही को सोंपे जाता हूं।

सज्जन सिंह ने रोते हुए कहा भैया महत्व घबराओ मत भगवान ने चाहे। 

 तो तुम अच्छे हो जाओगे सुबह की को तुम मैंने हमेशा अपनी बेटी ही समझा है और जब तक जिऊंगा ऐसा ही समझता रहूंगा तुम निश्चित रहे हो कुछ और इच्छा हो तो वह भी कह दो  महतो ने विनती नेत्रों से देखकर का और नहीं कहूंगा भैया भगवान तुम्हें सदा सुखी रखे सजन रामू को बुला कर लाता है और उससे वह जो भूल चूक हुई शमा कर दो मैं तो नहीं भैया उसे पापी का मुंह में नहीं देखना चाहता।
उसके बाद गोदान की तैयारी होने लगी रामू को गांव वालों ने समझाया पर वेस्टी करने पर राजी नहीं हुआ का जिस पिता ने मरते समय मेरा मुंह देखना स्वीकार नहीं किया हुआ है ने मेरे पिता है ने में उसका बेटा हूं।

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