Sunday, October 27, 2019

सुभागी का दुख भरा जीवन।

सुभागी ने तो कुछ जवाब नहीं दिया बात बढ़ जाने का भय था। 

मगर उसके मां बाप बेटे सुन रहे थे मैं तो से ले रहा गया बोला क्या है रामू से गरीब बन से क्यों लड़ते हो रामू पास आकर बोला तुम क्यों बीच में कूद पड़े मैं तो उसको कह रहा हूं तुलसी जब तक मैं जिंदा हूं तुम उसे कुछ नहीं कर सकते मेरे पीछे जो चाहे करना बेचारी का घर में रहना मुश्किल कर दिया है।
रामू आपको बेटी बहुत प्यारी है तो उसे गले में बांध कर रखी है मुझसे तो नहीं रुका जाता तुलसी अच्छी बात है अगर तुम्हारी यह मर्जी है तो यही होगा मैं कल गांव के आदमियों को बुलाकर बटवारा करा दूंगा तुम से अलग हो जाओ सुभागी अलग नहीं होगी।

रात को तुलसी लेट तो वह पुरानी बात याद आई। 

जब राम के जन्म जन्म उत्सव में उन्होंने रुपए कर्ज लेकर जलसा किया तो और सुबह की पैदा हुई तो घर में रिपेयर रहते हुए भी उन्होंने एक कोढ़ी तक खरीदने की अनुमति नहीं दी पुत्र को रतन समझौता पुत्री को पूर्व जन्म के पापों का दंड वेतन कितना कठोर निकले और यह दिल कितना मंगल में है इससे उनके मां-बाप सोचने लगे।
दूसरे दिन में तो ने गांव के आदमियों को इकट्ठा करके कहां पंचो आगरा मुक्का और मेरे घर का निवारण नहीं होता मैं चाहता हूं कि तुम लोग इंसाफ से जो कुछ मुझे दे दो मैं लेकर अलग हो जाऊं

 रात दिन की बस अच्छी नहीं है। 

 गांव के मुखिया बाबू सज्जन सिंह बड़े सज्जन पुरुष थे उन्होंने राम को बुलाकर पूछा क्यों भाई तुम अपने आप से अलग रहना चाहते हो तुम्हें शर्म नहीं आती मां-बाप को अलग कर देते हो रामा मैं ठिठाई के साथ का जब एक साथ गुजरने वह तो अलग हो जाना ही अच्छा है।
तुलसी देख लिया आप लोगों ने इसका मिजाज भगवान ने बेटी को दुख दे दिया नहीं तो मुझे खेती-बाड़ी लेकर क्या करना था जहां रहता वही कमाता खाता भगवान ऐसा बेटा वेरी को भी मैं लड़के से लड़की बड़ी हो रामू ऐसा सोचने लगा।

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