Sunday, 18 August 2019

बिच्छू संस्कृति वरुण और मंत्रों को लिखने के लिए विशेष प्रशिक्षण प्राप्त करने लगे हैं।

जापान में संस्कृति को भीतर बसा के स्थान प्राप्त हुआ है। 

बिच्छू संस्कृति वरुण और मंत्रों को लिखने के लिए विशेष प्रशिक्षण प्राप्त करने लगे हैं।
सिंघम का अर्थ ऐसी लिपि जो सीख देती है आज भी जापानी विद्वान संस्कृति के अध्ययन के लिए उत्सुक रहते हैं वास्तव में बौद्ध ग्रंथों की भाषा के होने के कारण संस्कृति भारत और जापान के मध्य एक महत्वपूर्ण कड़ी का कार्य कर रही है सातवीं शताब्दी में राजकुमार छोटू के समय चीनी भाषा में अनूदित बौद्ध ग्रंथ जापान पहुंचे थे, वहीं ग्रंथों के दुश्मन से बहुत प्रभावित हुए त्रिविध मूल्य के उत्तर में बहुत ही ऊंचे पठार पर बसा है।

 तिब्बत के लोग बुधनी माना जाता है।

तिब्बत के राजा नरदेव ने अपने एक मंत्री फोन में वोट के साथ शोले श्रेष्ठ विद्वानों को मगध भेजा इन विद्वानों ने अपने भारतीय शिक्षकों से ज्ञान प्राप्त किया उस समय के पश्चात थाना कुसमी चले गए थे, ऐसा कहा जाता है। कि भारतीय लिपि के आधार पर तिब्बत के लिए एक नई लिपि का आविष्कार किया आज तक इस लिपि का प्रयोग किया जाता है। तथा ऐसा मालूम पड़ता है कि पुस्तकों ले गए तिब्बत लोड कर दोनों में समर्थन ने तिब्बती लोगों के लिए नए व्याकरण की रचना की यह पानी यह पानी द्वारा लिखी संस्कृत व्याकरण पर आधारित मानी जाती है संवादों के माध्यम से यह आई साहित्य के प्रति राज्य इतना आकर्षित हुआ है। कि उसने साहित्य के दिन हो 4 साल बिता दिए उसने संस्कृत में तिब्बती भाषा में अनुवाद की नींव डाली है।

भारत और जापान के सांस्कृतिक संबंधों का इतिहासिक 15 वर्ष पुराना माना जाता है। 

लेकिन भारतीय संस्कृति की जापान में प्रवेश के लिखित प्रमाण चंपारण सुबह उनसे है उस समय कोरिया के सम्राट ने जापानी सम्राट के लिए अनेक प्रकार की भेंट भेज इसमें बहुत मूर्तियां सूत्र पूजा में प्रयोग होने वाली संस्थाओं और एक साथ मूर्तियां कलाकार और शिकारी सम्मिलित हुए हैं, उनके साथ और इस तरह भारत में और जापान में संस्कृति भाषा का उल्लेख गया और इसी के कारण भारत और जापान के बीच बहुत गहरा संबंध है इसी भाषा के कारण और माना जाता है। कि आज भी पहले भी और आने वाले दिनों में भी यह बस इसी तरह चलती रहेगी भारत और जापान के बीच में।

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