Sunday, 28 July 2019

अंश कवित्री कल्पना करती है।

 मनुष्य की तरह पेड़ भी भयभीत होते हैं। 

बेबी से चीखते चिल्लाते भी है वह भी बचाव के लिए पुकारते हैं जैसे हम भयानक सपने देखते हैं तो डर से चिल्लाते पढ़ते हैं। वैसे ही पेड़ों को भी सपने आते हुए सपने बड़े भयंकर है। उनके सपनों में चमकती हुई कुलड़िया पेड़ों को काटने के लिए तत्की। है और पेड़ इन खिलाड़ियों के डर से जीत रहे हैं कविता की इन पंक्तियों में कुछ प्रश्न पूछे गए हैं कवित्री पेड़ों के पक्ष में यह सवाल पूछ रही है कि उसके सवाल उस सभ्य समाज से हैं। जो पेड़ों के साथ नहीं जीता बल्कि पेड़ों को अपने उपयोग के लिए नष्ट करता है यह प्रश्न हम सब से भी किए गए हैं। कविता में इस दृश्य की कल्पना की गई है लेकिन वास्तविकता में यह केवल कल्पना नहीं बल्कि सच है। इन पंक्तियों में एक बहुत बड़ी चिंता व्यक्त की गई है वह जिंदा है। घटित हुई वृद्धि हुई हरियाली एवं मानव जीवन पर इसका विनाशकारी प्रभाव सूची की इस स्थिति का जिम्मेदार कौन है इसके जिम्मेदार हैं।

कोई सरोकार नहीं हम बस अपने स्वार्थ में अंधे हैं। 

सही मायने में मनुष्य वह है जो अपने स्वार्थ को छोड़ कर भेज से चीखते पेड़ों के दुख को महसूस करें और इन्हें बचाने का प्रयास करें इसलिए कभी तेरी पसंद करती है क्या तुमने कभी सुना है सपनों में चमकती खिलाड़ियों के पैसे पेड़ों की चित्कार आप समझ गए होंगे कि वह वास्तव में प्रश्न उत्तर दिए कई बार हम किसी बात के आग्रह के लिए मुझे पसंद के रूप में रखते हैं कवित्री का आग्रह है कि हम बेबी पेड़ों की चित्कार महसूस करनी चाहिए वैसे भी पेड़ों पर आए संकट मनुष्य पर गिरा संकट है और इस तरह पेड़ों का वास्तव में मनुष्य का ही है आखिर पेड़ नहीं रहेंगे तो मनुष्य रहेंगे।

पृथ्वी में पेड़ों के अंगों में मन्नू अंगों की कल्पना किए कवित्री कविता में की गई कल्पना हम दूसरों के दुख से जुड़ती है। 

हम दूसरों से सहानुभूति रखने सीखनी है। और अधिक संवेदनशील बनती है यह कविता में प्रकृति के दुख से जोड़कर अधीक्षक और मनुष्य बनाती है जो हमारा कोई आदमी छोड़ कर चला जाता है तो वह पीड़ा होती है। वैसे ही पीड़ा किसी पेड़ के काटने पर भी होनी चाहिए क्योंकि उन पर हमारा जीवन निर्भर है। वह हमारी जीवन शक्ति है उनसे भी जीवन होता है धरती पर गिरा दिया हुआ अच्छा लगता है।

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