Thursday, 11 July 2019

लड़ाई से मैं नहीं डरता और जीवन की आखिरी घड़ी तब माहिम की रक्षा करूंगा,

सामत सरदार भी अब महाराज की भंवर धारा में बेकर व्यवहार बुद्धि से दुर्भावना के क्षेत्र में पहुंच गए।

 उन्हें के मुंह से निकला धन्य है, महाराज मिलने का मामला है रणथंबोर अब तुम्हारा घर है। आराम से यहां रो और विश्वास रखो कि अब किसी की हिम्मत नहीं जो तुम्हारी तरफ तिरछी आंखों से देखे कोई कष्ट हो, तो हमें के ना जाओ।
कानो कानो उड़ती खबर दिल्ली के बादशाह अलाउद्दीन खिलजी तक पहुंची तो, वहां तमाम उठा हमीर की है। हिमाकत कि मेरी जोर को आंसर दे क्या तुम नहीं जानते हमें तो। तुमने माहिम को अपनी छतरी खेर में बोलो को माफ करना जानता हूं। कोई बात नहीं माहिम को अपनी देखरेख में मुझे सुपुर्द करो और अपने कुसूर की माफी मांगो।

अलाउद्दीन का यह संदेश हम्मीर के पास पहुंचा तो वे मुस्कुराए उसने लिखा माहिम को शरण दी है।

 कोई नौकर नहीं रखा है। अपना सर्वस्व लुटा कर मिश्रा नाथ की रक्षा करना हमारे संस्कार हैं सपने में भी उम्मीद ने रखिए की मांग को मैं आपके दरवाजे लाऊंगा आप जो मुनासिब समझा कीजिए जवाब क्या था एक पीड़िता जिसने खिलजी के बारूद में आग लगा दी। और उसने कुछ दिन बाद ही, अपनी फौजों के साथ रणथंबोर का किला  घेर  लिया।

लड़ाई झगड़े से क्या फायदा हमीर लाम मीम को मुझे  खिलजी का यह आखिरी संदेश था।

 लड़ाई से मैं नहीं डरता और जीवन की आखिरी घड़ी तब माहिम की रक्षा करूंगा, हमीर का यह आखिरी  उत्तर था।
दूसरे दिन में रणबीर जुटी ऊंची पहाड़ी पर बना रणथंबोर का किला और चारों ओर फैली साहिब खोजे एक तरफ अपने बादशाह के लिए लड़ने वाली भौजी तो, दूसरी तरफ अपनी आन पर मर मिटने वाले सिपाही एक तरफ भरपूर साधन तो।
 दूसरी तरफ भरपूर लड़ाई क्या थी यह बात की बाजी और यह बाजी जिसका निशाना एक आदमी के प्राण और की हजारों प्राण सरसों के दानों की तरह हथेली पर।
दोनों तरफ हजारों योद्धा का माई बादशाह की ताकत जितनी चिति दिल्ली उस पर कर देत। हम पर हम अमीर की शक्ति दारा की जो लहर पे जाती फिरने लौटती पर टूटती तलवार  को न्याय करती और हर गिरता सिपाही हजार को  के रास्ते खुले हुए थे। आई के बंद करो का खजाना और कुबेर का कोर्स भी कब तक टिक पाता।

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