Friday, 21 June 2019

हजारों वर्ष पूर्व ही भारतीय चिंतन में सभी बात का उल्लेख मिलता है।

वैदिक साहित्य के अनुसार व्यक्ति को समाज के अन्य लोगों में बांट कर वस्तुओं का उपयोग करना चाहिए

 ना कि अपने आप के लिए इससे स्पष्ट होता है। यह मेरा है यह तेरा है ऐसा विचार करने वाले व्यक्ति निम्न कोटि के होते हैं उच्च चरित्र वाले कि वह बोलता समानता के कल्याण पर आधारित होना, चाहिए सर्वे में उल्लेख किया गया है। कि भूखे मित्र नौकर अतिथि तथा पशु पक्षियों को ने खिलाकर से अकेला वह करना वाला भी होता है। जहां पाश्चात्य आर्थिक व्यवस्था अधिक अधिक संतुष्टि का पत मानती है। वहां भारतीय आर्थिक चिंतन में पूर्ण संतुष्टि की प्राप्ति मानी गई है।
उच्च चरित्र वाले व्यक्तियों के लिए तो संपूर्ण विश्व की कुटुंब आर के समान है, भारतीय संस्कृति में सभी का कल्याण हो, तथा सभी की सेवा को ही, सर्व बाबू मानव धर्म माना गया है। वर्तमान संदर्भ में जब धन  और संपत्ति में समान वितरण से अमीर गरीब के बीच की खाई बढ़ गई तो बार-बार चीन भारतीय आर्थिक चिंतन की समय पर वह सहयोग की ना समाज है। या पूर्ण वितरण द्वारा समानता की स्थापना सहायक हो सकती है।

 एवं सामाजिक कल्याण में वर्दी ला सकती है।

हजारों वर्ष पूर्व ही भारतीय चिंतन में सभी बात का उल्लेख मिलता है। कि मनुष्य की आवश्यकताएं समिति होती है, उनका उनकी मूर्ति के साधन सीमित ही होती है। प्रणाम और शक्ति की कुछ आवश्यक पूरी ना हो पाने से वे दुखी हो, जाता है, कौन इसमें कहा गया है कि कोई व्यक्ति कितना ही धन प्राप्त करी है। उस धन से नहीं हो सकता जिस प्रकार भोजन करने से पेट भर जाता है। परंतु बनी रही है उसी प्रकार धन प्राप्त करने की इच्छा कभी पूरी नहीं है। प्राचीन भारतीय साहित्य में यह कहा गया है, कि मनुष्य की आवश्यकताएं समिति है नहीं होती है। अपितु एक आवश्यकता पूर्ण होने पर दूसरी नई उत्पन्न हो जाती है। मनुष्य ज्ञान व परिश्रम द्वारा आजीविका उत्पन्न करें ताकि समाज में हड़ताल नहीं होता है,

क्योंकि दरिद्रता से समाज में आवश्यकताओं की संतुष्टि नहीं हो सकती है।

प्राचीन भारतीय साहित्य में शरीर मन बुद्धि एवं आत्मा के सुख की कल्पना की गई है, जिसे चतुर्वेदी सुख के नाम से जाना जाता है। चतुर्वेदी सुख की प्राप्ति के लिए कर्तव्य के रूप में धर्म अर्थ काम व मोक्ष विचार पूर्व शर्तों का उल्लेख किया गया है, जिन्हें पुरुष कहते हैं। प्राचीन भारतीय चिंतन पुरुषों की तुलना नदी से की गई है। वह काम नदी के प्रवाह हैं, तथा धर्म में मोक्ष इस नदी के लोग तक बंधन है।

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