Saturday, 29 June 2019

युद्ध के बाद हुई मैया को भारत से पलायन करना पड़ा।

गुजरात के बहादुर साधने में चित्तौड़ का घेरा डाला।

रानी कर्णावती राणा सांगा की पत्नी ने ह्यूम आयु का राखी भेजकर सहायता मांगी किंतु हमारे आने में विलंब किया। फलस्वरूप चित्तौड़ पर बहादुर संस्था का अधिकार हो गया, एवं शासकीय  चौसा का युद्ध हुआ इस युद्ध में पराजित हो गया। में हुमायूं ने अपने भारत का विजय अभिमान प्रमाणित किया, और सर्वप्रथम लोहार पर कब्जा किया। उसने सिकंदरपुर के मछीवाड़ा के युद्ध में पराजित कर बंद पंजाब की अधिकार कर लिया। को हिमायू दिल्ली की गद्दी पर बैठा।  को जब हुमायूं दिन पता नी स्तुति पुस्तकालय की सीढ़ियों से उतर रहा था। तो उसका पैर फिसल गया।  जनवरी को उसकी मृत्यु हो गई सुर साम्राज्य का संस्थापक था।

यह जान पूर्ण राज्य के अंतर्गत से सारा सर बिहार का जमींदार का था। 

फरीद को बचाने शितोले मावे भाइयों के कारण सुखी नहीं था। वह दक्षिणी बिहार के प्रति बकाए का लोहानी की सेना में चला गया। इसी ने फरीद द्वारा शेर मार दिए। जाने के कारण सरंगा की उत्पन्न प्रकार की में कन्नौज के युद्ध के बाद हुई मैया को भारत से पलायन करना पड़ा।
 और इस प्रकार से साहेब को भारत का सिहासन प्राप्त हुआ। सम्राट बनने के बाद शेरशाह ने बंगाल ग्वार लिए। और मानव पर विजय प्राप्त की  में शेरशाह ने गिरी सुमेल का युद्ध में मारवाड़ साहेब राव मालदेव को पराजित किया शेरशाह ने रावण से युद्ध बड़ी मुश्किल से जीता क्योंकि मालदेव के सेनानायक जेता व्यकुंता ने वीरता पूर्वक संघर्ष किया तभी शेरशाह ने कहा था। मैं मुट्ठी भर बाजरे के लिए हिंदुस्तान की सूचना को देता में कालिंजर के किले पर आक्रमण के दौरान बारूद में विस्फोट होने में शेरशाह की मृत्यु हो गया।
अपने शासन प्रबंध और किए गए। कार्यों की दृष्टि से शेरशाह मध्यकालीन शासकों में एक विशेष स्थान रखता है।

बड़ी बड़ी सड़कों का निर्माण करवाया सासाराम का मकबरा भारत की सबसे बड़ी इमारतों में एक है।

अकबर का जन्म अमरकोट सिंध में राणा वर्षफल के महल में  ईसवी को हुआ था उसके पिता हिमायू और माता अमिता मनु बेगम ने यहां के राजपूत राजा के महल में शरण ली थी । को हनुमान जी की मृत्यु के बाद अकबर दिल्ली का शासक बन गया, मर गया  प्रधानमंत्री बन गया।

राजश्री का विधि विधान के जंगलों में ठीक उस समय बताइए

एक विजेता होने के साथ साथ हर्ष एक कुशल प्रशासक भी था।

वर्धन वंश की शक्ति और प्रतिष्ठा का संस्थापक परिवार जून तथा परिवारजनों के 3 संस्थानों थी राज्य वन और हर्ष तक पूरे राजश्री पूर्ति की राशि का विवाह मुख्य वंश के राजा गर्मी से हुआ प्रभावित के काल में उसका आक्रमण हुआ। प्रमाण काल में उनके लड़ने के लिए अपने दोनों पुत्रों को भेजा इसी दौरान परिवारों कारणों की मृत्यु हो। गई परमाणु का बंगाल के घोड़े शासक संस्थान द्वारा इसमें उनका वध कर दिया गया सुर में उनका छोटा भाई जिस समय हर्षवर्धन शासन बनावे अनेक समस्याओं से घिरा हुआ था

 उसकी बहन राजश्री कानो कान के का षणमुगम आहोर की हत्या मालवा के शासक ने करी थी।

राजश्री के करो जनों के कारण दिया लिया गया साथ ही अपने बहनोई के राज्य कोनो नाच की जिम्मेदारी भी हर्षवर्धन पर थी। प्रारंभिक समस्याओं का समाधान हर्षवर्धन ने बड़ी बहादुरी के साथ किया सर्वप्रथम बॉडीबिल्डर की साहित्य से और स्नेह राजश्री का विधि विधान के जंगलों में ठीक उस समय बताइए जब वह चिंता बनकर जलने तक जा रही थी। इस प्रकार ने अपनी बहन के सरंक्षण के रूप में रोजना का शासन भार उठाना भी स्वीकार किया हर्षवर्धन के संपूर्ण भारत का एक केंद्रीय सत्ता के अधीन करने हेतु कई युद्ध लड़े हर्ष का सबसे महत्वपूर्ण युद्ध दक्षिण भारत के चालू के साथ हुआ इस प्रकार युद्ध में हर्ष पराजित हुआ और उसे दक्षिणी सीमा नर्मदा को मानना पड़ा इसी युद्ध सेव के विषय की जानकारी पुलकेशिन द्वितीय के डोले अभिलेख से प्राप्त होती थी।

 जो रवि करते द्वारा लिखा गया था। 

उसने अशोक के सामने अपने पराजित के कार्य भी किए नालंदा विश्वविद्यालय की अंतरराष्ट्रीय ख्याति हर्षवर्धन के समय ही हुई हर्षवर्धन प्रति 5 वर्ष प्रयास में महा मोक्ष परिषद का आयोजन करता था जिसमें दीन दुखियों एवं पक्षियों को उधारण पूर्वक दान दिया जाता था। उसके कार में प्रसिद्ध चीनी यात्री अविनाश ने भारत की यात्रा की एवं प्रयास महा मोक्ष प्रसिद्ध में भाग लिया करो राज्य सभा हर्ष के काल में प्रसिद्ध चीनी यात्री आने में भारत का हर्षवर्धन एक उच्च कोटि का विद्वान था। जिसे नागानंद परी कथा में बाढ़ फटे हुए मयूर जैसे विद्वान आश्चर्य पाते थे। वर्ड भट्ट में 68 चरित्र के बाद में भरी नामक संस्कृति के प्रसिद्ध ग्रंथ लिखे मयूर में स्थित की रचना की।

Friday, 21 June 2019

हजारों वर्ष पूर्व ही भारतीय चिंतन में सभी बात का उल्लेख मिलता है।

वैदिक साहित्य के अनुसार व्यक्ति को समाज के अन्य लोगों में बांट कर वस्तुओं का उपयोग करना चाहिए

 ना कि अपने आप के लिए इससे स्पष्ट होता है। यह मेरा है यह तेरा है ऐसा विचार करने वाले व्यक्ति निम्न कोटि के होते हैं उच्च चरित्र वाले कि वह बोलता समानता के कल्याण पर आधारित होना, चाहिए सर्वे में उल्लेख किया गया है। कि भूखे मित्र नौकर अतिथि तथा पशु पक्षियों को ने खिलाकर से अकेला वह करना वाला भी होता है। जहां पाश्चात्य आर्थिक व्यवस्था अधिक अधिक संतुष्टि का पत मानती है। वहां भारतीय आर्थिक चिंतन में पूर्ण संतुष्टि की प्राप्ति मानी गई है।
उच्च चरित्र वाले व्यक्तियों के लिए तो संपूर्ण विश्व की कुटुंब आर के समान है, भारतीय संस्कृति में सभी का कल्याण हो, तथा सभी की सेवा को ही, सर्व बाबू मानव धर्म माना गया है। वर्तमान संदर्भ में जब धन  और संपत्ति में समान वितरण से अमीर गरीब के बीच की खाई बढ़ गई तो बार-बार चीन भारतीय आर्थिक चिंतन की समय पर वह सहयोग की ना समाज है। या पूर्ण वितरण द्वारा समानता की स्थापना सहायक हो सकती है।

 एवं सामाजिक कल्याण में वर्दी ला सकती है।

हजारों वर्ष पूर्व ही भारतीय चिंतन में सभी बात का उल्लेख मिलता है। कि मनुष्य की आवश्यकताएं समिति होती है, उनका उनकी मूर्ति के साधन सीमित ही होती है। प्रणाम और शक्ति की कुछ आवश्यक पूरी ना हो पाने से वे दुखी हो, जाता है, कौन इसमें कहा गया है कि कोई व्यक्ति कितना ही धन प्राप्त करी है। उस धन से नहीं हो सकता जिस प्रकार भोजन करने से पेट भर जाता है। परंतु बनी रही है उसी प्रकार धन प्राप्त करने की इच्छा कभी पूरी नहीं है। प्राचीन भारतीय साहित्य में यह कहा गया है, कि मनुष्य की आवश्यकताएं समिति है नहीं होती है। अपितु एक आवश्यकता पूर्ण होने पर दूसरी नई उत्पन्न हो जाती है। मनुष्य ज्ञान व परिश्रम द्वारा आजीविका उत्पन्न करें ताकि समाज में हड़ताल नहीं होता है,

क्योंकि दरिद्रता से समाज में आवश्यकताओं की संतुष्टि नहीं हो सकती है।

प्राचीन भारतीय साहित्य में शरीर मन बुद्धि एवं आत्मा के सुख की कल्पना की गई है, जिसे चतुर्वेदी सुख के नाम से जाना जाता है। चतुर्वेदी सुख की प्राप्ति के लिए कर्तव्य के रूप में धर्म अर्थ काम व मोक्ष विचार पूर्व शर्तों का उल्लेख किया गया है, जिन्हें पुरुष कहते हैं। प्राचीन भारतीय चिंतन पुरुषों की तुलना नदी से की गई है। वह काम नदी के प्रवाह हैं, तथा धर्म में मोक्ष इस नदी के लोग तक बंधन है।

भारतीय प्राचीन शास्त्र के अनुसार काम विषय को चलाने वाला एक काम से बता करता है।

प्राचीन भारतीय साहित्य में धर्म का अर्थ ब्राह्मणों से नहीं है।

 अपितु की अवधारणा बहुत व्यापक है, गरम दस्तूर है। वह उसका संबंध आजीविका की शुद्धता से है, श्रेष्ठ बनने के लिए धर्म ढाणी में अचार नहीं है। धर्म का आधार नैतिक नियम में सादर चरण है। अतः धर्म समाज में व्यवस्था बनाए रखने के हैं।
शास्त्रों में मनुष्य की सुख-सुविधा का आधार धर्म को मनाया गया है, एवं धर्म का मूल अर्थ को मन माना गया है। वेदों में वैभव मुद्रा तथा संपत्ति को धन माना गया है। प्राचीन साहित्य में विद्या भूमि सोना-चांदी पशु धन धान्य धातु निर्मित आदि को अर्थ माना गया है।
भारतीय प्राचीन शास्त्र के अनुसार काम विषय को चलाने वाला एक काम से बता करता है। जिस प्रकार के व्यक्ति के काम होते हैं, व्यक्ति भी वैसा ही बन जाता है। अर्थ वेद में काम को ही, विविध कामनाओं के रूप में विभिन्न कार्यों का कारण व उत्पत्ति स्थान माना गया है।

प्राचीन आर्थिक चिंतन थे, के अनुसार धन साधन है। 

साध्य नहीं अपने आप को इच्छाओं के रहिता करते हुए बंधन से दूध नाही मुख से इसे आवागमन से बहुत चक्कर से मुक्ति भी कहा जाता है। एक ऐसी व्यवस्था जिसके तहत किसी निश्चित क्षेत्र में आर्थिक गतिविधियों का संचालन अर्थव्यवस्था के लाती है। ऐसी आर्थिक प्रणाली जिसमें उत्पत्ति के साधनों पर निजी व्यक्तियों का स्वामित्व व नियंत्रण होता है, पूंजीवादी अर्थव्यवस्था  कहलाती है।
ऐसी आर्थिक प्रणाली जिसमें उत्पत्ति के सभी साधनों पर सरकार द्वारा अभिव्यक्त संपूर्ण समाज का स्वामित्व होता है।

 समाजवादी अर्थव्यवस्था के लाती है, 

ऐसी आर्थिक प्रणाली जिसमें निजी और सार्वजनिक क्षेत्र दोनों का शहर होता है। मिश्रित अर्थव्यवस्था कहलाती है। प्राचीन भारतीय आर्थिक चिंतन सभी आर्थिक विचारों का सार है। जिन्हें भारत में समस्त प्राचीन ग्रंथों में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है, एकात्म मानव का अर्थ है। मानव शरीर मन बुद्धि व आत्मा का एकीकृत रूप चक्रवर्ती सुख शरीर मन बुद्धि व आत्मा के सुख की प्राप्ति के लिए प्राचीन भारतीय आर्थिक चिंतन में चार पुरुषार्थ धर्म अर्थ काम व मोक्ष का उल्लेख किया गया है।
पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की विशेषताएं समझाइए। समाजवादी एवं मिश्रित अर्थव्यवस्था के गुण दोष का उल्लेख करो, से मृत एवं सहयोग उपयोग की अवधारणा स्पष्ट कीजिए प्राचीन भारतीय आर्थिक चिंतन पर एक लेख लिखिए।

Thursday, 20 June 2019

मिश्रित अर्थव्यवस्था होती है।

निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्र का शैक्षिक व श्रीमती अर्थव्यवस्था के सबसे महत्वपूर्ण विशेषताएं हैं। 

निजी तथा सार्वजनिक दोनों का सीएसएसयू है। सामाजिक लाभ के उद्देश्य से महत्वपूर्ण रोगों पर सरकार का अधिक होता है। जैसे जल विद्युत का उत्पादन किया जाता है। सारिका सरकार द्वारा भी किया जाता है। इस आर्थिक प्रणाली में भारी वे आधुनिक उद्योगों का संचालन विकास सरकार द्वारा किया जाता है। तथा कुटीर उद्योग कृषि कार्य आदि निजी क्षेत्र के अधीन होते हैं। इनके अतिरिक्त कक्ष की स्थापना भी की जाए।
मिश्रित अर्थव्यवस्था में वस्तु की कीमत निर्धारित की दोहरी प्रणाली होती है। निजी क्षेत्र में वस्तुओं की कीमत बाजार में स्वतंत्र रूप से होती है। परंतु सरकार कुछ मूल्य को तय करने का अधिकार अपने पास रखती है। जो सामान्य आदमी द्वारा उपयोग की जाती है। उदाहरण के लिए भारत में पेट्रोल डीजल के मूल्य सरकार द्वारा किए जाते हैं। मिश्रित अर्थव्यवस्था होती है।

जिसमें सरकार पूर्ण नियोजन के साथ सामाजिक एवं आर्थिक नीतियों निर्माण करती है। 

इन्हीं नीतियों के अनुरूप सामाजिक कार्यों को करती है। जैसे नदी घाटी परियोजना का निर्माण पेयजल सिंचाई पर्यटन मछली पालन विद्युत उत्पादन अधिकारियों का विकास करना सामाजिक लाभ के लिए आम जनता आपूर्ति करना सामाजिक महत्व की दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर सरकार का नियंत्रण होने के कारण सरकार नियोजन किस प्रकार निर्भर करती है। कि सभी सत्रों का समान रूप से विकास हो सकता है। देसी शिक्षा चिकित्सा सड़क परिवहन पेयजल इत्यादि परिजनों का विस्तार एवं विकास।
मिश्रित अर्थव्यवस्था में नीचे क्षेत्र में उत्पादन करने उपभोग करने विनिमय तथा वितरण करने की व्यक्तिगत स्वतंत्रता दी है।

लेकिन यह स्वतंत्रता सामाजिक हित या कल्याण में वृद्धि करने

 की सत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं डाल सकते इसलिए सरकार इसे स्वतंत्रता पर आंशिक नियंत्रण रखती है। जैसे सार्वजनिक स्थलों पर धूम्रपान तथा मकानों का निषेध होना बाल बाल विवाह मृत्यु भोज आयोजन इत्यादि पर रोके।
विकास आर्थिक विकास के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों के दोहे ने वस्तुओं और सेवाओं के उपयोग की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए होरे मानवीय मूल्यों और नैतिकता के हादसे में विश्व के पूंजीवादी एवं समाजवादी आर्थिक प्रणाली को विकास के एक विकल्प मार्ग को खोजने पर विशेष कर दे दिया जाता है। ऐसी परिस्थितियों में भारतीय आर्थिक चिंतन परंपरा का अध्ययन विषय का आर्थिक समस्याओं के समाधान की दिशा में मार्ग पर स्थित कर रहा है।

अर्थव्यवस्था समान कार्य के लिए समान मजबूरी के सिद्धांत पर कार्य करती है।

समाजवादी अर्थव्यवस्था से भरा एक ऐसी अर्थ प्रणाली से अमृत जिसे उत्पत्ति की के सभी साधनों पर सरकार द्वारा अभी तक संपूर्ण समाज का स्वामित्व होता है।

 अर्थात आर्थिक क्रियाओं का संचालन केंद्र द्वारा संविधान के उद्देश्य से किया जाता है।
कार्ल मार्क्स द्वारा विकसित समाजवादी विचारधारा से प्रभावित होकर सन 1917 में रूस की क्रांति हुई एवं समाजवादी अर्थव्यवस्था का प्रारंभ हुआ। और उसके बाद शेष कोर्स इन चीन युगोस्लावियन आदि देशों में आर्थिक प्रणाली को अपने-अपने परंतु वर्तमान में चीनी को छोड़कर शेष देशों से इस प्रणाली को छोड़ दिया है।
अर्थव्यवस्था में उत्पादन के भौतिक साधन अर्थात भूमि  कारखानों पूंजी खाने अधिक पर समाज या समाज का स्वामित्व और नियंत्रण होता है। इसे पूरा लिस्ट में नाम का उद्देश्य या निजी हित के लिए आर्थिक गतिविधियों का संचालन नहीं होता है।

व्यवस्था में वस्तुओं में उपयोग हो तू भोक्ता के चयन के प्रश्न पत्र उनकी वस्तुएं तक रहती है।

 जिन्हें सरकार के निर्देशानुसार किया गया है। सरकार द्वारा निर्धारित मात्रा में ही उपभोक्ता द्वारा उपभोक्ता किया जाएगा समाजवादी अर्थव्यवस्था में समाजवादी आर्थिक लक्ष्यों में निर्धारित प्राप्ति हेतु। एक केंद्रीय सत्ता होती है। मैं आर्थिक निर्णय से क्या उत्पादन करना है। उत्पादन कैसे करना है। वह अधिनियम द्वारा ही लिए जाते हैं। अर्थव्यवस्था समान कार्य के लिए समान मजबूरी के सिद्धांत पर कार्य करती है। अतः इस आर्थिक प्रणाली में वर्ग संघर्ष की संपत्ति हो जाती है। साथ ही निजी पूंजी स्थापित करने हेतु। अवसरों की कमी के कारण आई कि ऐसा मानता भी कम हो जाती है।
समाजवादी अर्थव्यवस्था में केंद्रीय सरकार द्वारा सभी प्रकार के आर्थिक निर्णय अधिक केंद्रों में समाजिक में समूह को ध्यान में रखकर ही लिखे जाते हैं। ने की निजी लाभ के उद्देश्य से।

समाजवादी अर्थव्यवस्था का विश्लेषण निम्न गुण और दोषों के आधार पर कर सकते हैं।

 यह आर्थिक प्रणाली पूंजीवादी वे समाजवाद दोनों के आदर्श में लक्षणों का आदेश दे सकता अनुसार समावेश करने का एक प्रयास के दूसरे शब्दों में यह प्रणाली पूंजीवादी में समाजवाद के बीच का रास्ता है। श्रीमती अवस्था एक ऐसी प्रणाली है।
जिसमें निजी और सार्वजनिक क्षेत्र दोनों का स्विच में होता है। यह निजी उपकरण इजी लाभों का समर्थन करती है। उस परंतु साथ ही साथ संपूर्ण समाज के हितों की रक्षा के लिए सरकार के अस्तित्व को भी महत्वपूर्ण मानती है। श्रीमती अर्थव्यवस्था में यह प्रयास रहता है। कि निजी और सार्वजनिक क्षेत्र दोनों संयुक्त रूप से किस प्रकार कार्य में जिसे देश के सभी वर्गों का आर्थिक कल्याण बड़े एवं देश में वृद्धि व विकास भी संभावना का प्रवाह स्वतंत्रता के पश्चात भारत में ऐसी प्रणाली को अपनाया जाता है।

पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में उपभोक्ता प्रस्तुत पुस्तक संपन्न होते हैं।

निजी संपत्ति का अधिकार पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में उत्पादन के घटक जैसे खाने का प्रयोग कारखाने मशीनें आदि सभी पर निजी व्यक्तियों का स्वामित्व होता है।

 इन साधनों के स्वामी अपनी इच्छा अनुसार इनका प्रयोग करने के लिए स्वतंत्र होते हैं। व्यक्तियों के संपत्ति रखने उसे बढ़ाने व उसे प्रयोग करने की पूर्ण स्वतंत्रता होती है।
पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में उपभोक्ता प्रस्तुत पुस्तक संपन्न होते हैं। अर्थात उपभोक्ता की आवश्यकता व उसकी इच्छा के अनुरूप हो ही उत्पादक वस्तुओं का उत्पादन करते हैं। इसे उपभोक्ता के उस चंपारण ऊपर कहा जाता है। इसे आर्थिक प्रणाली अपनी मैं उपभोक्ता अपनी आई को इच्छा अनुसार व्यय करने के लिए स्वतंत्र होता है।
 वक्ता को सर्वोच्च स्थान प्राप्त करने हेतु के कारण इसके आर्थिक प्रणाली में उपभोक्ता को बाजार का राजा कहा जाता है।

प्रत्येक व्यक्ति अपनी इच्छा अनुसार किसी भी आर्थिक गतिविधि का संचालन कर सकता है। 

उत्पादन के लिए तकनीकी करने की उपयोगिता स्थापित करने की पूर्ण स्वतंत्रता होती है। सरकार को कोई हंसता पेश नहीं होने के कारण पूंजीवादी अर्थव्यवस्था वाली अर्थव्यवस्था भी कहलाती है।
पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में विक्रेताओं के बीच अपने अपने उत्पादक अथवा वस्तुओं को बचने के लिए तथा कर्ताओं के बीच अपनी अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए वस्तुओं को खरीदने के लिए प्रयुक्त प्रतिभूतियों चलती रहती है। जिससे बाजार में कुशलता बढ़ती है। विज्ञापन देना हार देना मूल्य में कमी कर देना आदि तरीके पर इस्थित पदों हेतु अपनाए जाते हैं।
पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में प्रत्येक व्यक्ति द्वारा किसी भी कार्य करने का निर्णय अथवा किसी वस्तु के उत्पादन का निर्णय मुख्य अतिथि से लागू भावना के आधार पर ही लिया जाता है। अर्थात काम करने के रूप में क्या वह कितना लाभ प्राप्त होता है।

 किसी प्रकार उपभोक्ता वस्तुओं को उपरोक्त निजी हित के लिए भी करते हैं।

पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में समाज दो वर्गों में विभाजित हो जाता है। उगम लगाने जोखिम उठाने वाला पूंजीपति कहलाता है। यह यह साधन संपत्ती वर्ग होता है। गोगो में काम करने वाले वर्ग सर में कहलाता है। यह साधन विहीन वर्ग होता है। पूंजीपतियों मेला बढ़ाने का उद्देश्य व श्रमिकों में शोषण से बचने का उद्देश्य वृक्ष संरक्षण को जन्म देता है।
संपत्ति के असमान वितरण के कारण पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में गरीब व अमीर की विषमता की खाई बढ़ती है। पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का निम्न गुण दोष के आधार पर विश्लेषण कर सकते हैं।

अर्थव्यवस्था एक ऐसा ढांचा है।

प्रत्येक देश में व्यक्ति अपनी जीविकोपार्जन के लिए विभिन्न प्रकार के आर्थिक क्रियाकलापों में सम्मेलन है। 

 किसान हो या श्रमिकों की हो या दुकानदार अध्यापक हो या डॉक्टर सभी अपनी अपनी आजीविका कमाने हेतु कार्य कर रहा है। विभिन्न आर्थिक वर्गों को द्वारा विभिन्न प्रकार के आर्थिक कार्यों के संपादन हेतु। किसी सुव्यवस्थित व्यवस्था प्रणाली की व्यवस्था होती है। व्यवस्था को ही कहा जा सकता है। कि एक ऐसी प्रणाली अथवा व्यवस्था जिसके द्वारा और लोग अपना जीवन करते हैं। अर्थव्यवस्था  कहलाती है।

अर्थव्यवस्था एक ऐसा ढांचा है।

 जिसमें जिससे विभिन्न वस्तुओं के उत्पादकों के बीच परस्पर समन्वय व सहयोग का जन्म होता है। अर्थव्यवस्था एक ऐसी प्रणाली है। जिसमें उत्पादन उपभोग विनिमय प्रणाली आर्थिक न्याय निरंतर चलती रहती है। सामान्य यह कहा भी यह काफी जा सकता है। कि एक ऐसी व्यवस्था जिसके तहत किसी भी क्षेत्र में आर्थिक गतिविधियों होता है। अर्थव्यवस्था के लाती है उदाहरण के लिए चीनी का उत्पादन चीनी मिल द्वार किया जाता है। चीनी का उत्पादन के लिए उत्पादक गन्ना किसान से मशीन एवं उपकरणों तथा बिजली ऊर्जा संयंत्रों से प्राप्त करता है। उत्पादित चीनी को देश के विभिन्न भागों में एक स्थान से दूसरे स्थान तक लाने ले जाने के लिए परिवहन के साधन रेल ट्रक जहाज आदि की आवश्यकता पड़ती है चीनी उत्पादन हेतु।

 विभिन्न उत्पादकों के प्रयोग में तालमेल का ढांचा भी अर्थव्यवस्था कहलाता है।

संपूर्ण गांव अथवा कस्बे के निवासियों का आर्थिक क्रियाकलापों का जीवन गांव की अर्थव्यवस्था राजस्थान राज्य के निवासियों के आर्थिक क्रियाकलापों का अध्ययन राजस्थान की अर्थव्यवस्था देश के निवासियों के अर्धवार्षिक लीला क्रियाकलापों का जन्म भारत की अर्थव्यवस्था के अंतर्गत की आती है।
किसी भी देश में उत्पादन उपयोग विनिमय वितरण आदि।

 आर्थिक क्रियाकलापों का संचालन अर्थव्यवस्था के स्वरूप पर निर्भर करता है।

 देश में आर्थिक क्रियाओं के संचालन में राज्य का हिस्सा कितना होगा आदि आधारों पर विषय की विभिन्न अर्थव्यवस्थाओं को हम निबंध निबंध 3 वर्गों में विभाजित कर सकते हैं।
अर्थ पूंजीवादी अर्थव्यवस्था से अभिप्राय एक ऐसी आर्थिक प्रणाली है। जिसमें उत्पत्ति के सभी साधनों पर निजी व्यक्तियों का स्वामित्व व नियंत्रण होता है। तथा आर्थिक क्रियाओं का संचालन निजी एवं किसी भी प्रकार का हस्त पैसे नहीं करती है।

मनुष्य द्वारा किया गया शारीरिक व मानसिक प्रयास श्रम के लाता है।

अर्थव्यवस्था को स्वतंत्र बाजार अर्थव्यवस्था बाजार एमउत्पादन एक महत्वपूर्ण आर्थिक गतिविधि है।

 किसी भी वस्तु के उत्पादन को अपने चरणों से होकर गुजरना पड़ता है। उत्पादन पर के संपादन हेतु विभिन्न उत्पादन साधनों की आवश्यकता होती है। किसी भी वस्तु के उत्पादन में परियों के साधनों की मात्रा पर निर्भर करती है। हमें इन उत्पादन के साधनों को निम्न भागों में बांट सकते हैं।
अर्थशास्त्र में भूमि शब्द का अर्थ मात्र मिट्टी यात्रा तन ही नहीं है। भूमि में भूमि के अतिरिक्त प्राकृतिक संसाधन जलवायु वनस्पति पर्वतजन खाने आदि सभी सम्मिलित है। उपलब्धता की दृष्टि से भूमि की आपूर्ति स्तर है। भूमि उत्पादन  अश्वशक्ति उपयोग के आधार पर अलग-अलग श्रेणी की होती है। उत्पादन प्रक्रिया में भूमि के प्रयोग के बदले भूस्वामी को दिया जाने वाला प्रतिफल  लगान कहलाता है।

वस्तुओं व सेवाओं के उत्पादन हेतु। 

मनुष्य द्वारा किया गया शारीरिक व मानसिक प्रयास श्रम के लाता है। प्रेम सद्भावना एवं मनोरंजन के उद्देश्य से किया गया प्रयास या परिश्रम अर्थशास्त्र में शर्म नहीं। माना जाएगा केवल परिश्रम को ही शर्म माना जाएगा जो उत्पत्ति के उद्देश्य से किया जाए एवं जिससे किसी आर्थिक परीत फल की आशा हो उदाहरण के लिए ग्रहणी की सेवाएं श्रम नहीं मानी जाएगी जबकि नौकर की उत्पत्ति का एक साधन है।जो प्रत्यक्ष रूप से मनुष्य से जुड़ा है जबकि अन्य साधन प्रत्यक्ष रूप से मनुष्य से संबंधित नहीं होते हैं। उत्पत्ति का एक गतिशील साधन है सभी श्रम उत्पादक नहीं होते हैं। अर्थात यह आवश्यकता नहीं है। कि श्रम के द्वारा उत्पत्ति हो क्योंकि उत्पादन प्रक्रिया में कई बार प्रयास करने पर भी चित्र परिणामों की प्राप्ति नहीं होती है। पादन प्रक्रिया में श्रमिकों को श्रम के बदले प्राप्त होने वाला प्रतिफल मजदूरी कहलाता है।

समस्त वस्तुएं एवं मानवीय योग्यताएं जो की वस्तुओं व सेवाओं के उत्पादन में होती है

 एवं जिससे मूल्य की प्राप्ति होती है संपत्ति कहलाती है संपत्ति का कुछ भाग व्यर्थ पड़ा रहता है तथा कुछ भाग आगे और संपत्ति के उत्पादन के लिए प्रयुक्त किया जाता है। पूंजी मनुष्य की संपत्ति का वह भाग है। जो और आगे उत्पत्ति करने के लिए प्रयुक्त किया जाता है। पूंजी उत्पादन का ही एक उत्पादित घटक है। जिससे प्राकृतिक संसाधनों के साथ उपयोग करके मनुष्य द्वारा अर्जित किया जाता है। पूंजी को उत्पादन का मानवीय उपकरण भी कहा जा सकता है। मशीन उपकरण कारखाने यातायात आदि पूंजी के उदाहरण है। पूंजी लगाने वाले को इसके बदले मिलने वाला प्रतिफल कहलाता है।
उत्पादन प्रक्रिया में भूमि पूंजी है। श्रम का गतिशील अल करने वाला आदमी चलाता है। उनमें उत्पत्ति के सभी साधनों को उचित अनुपात निर्धारित का उत्पादन करता है अग्नि जोखिम को शेयर उत्पादन करता है। अतः इसे सांसी भी कहा जाता है।