Saturday, November 16, 2019

मनोहर की बचपन की कहानी से दुकानदार वाले के आंसू आ गया।

 आज भी मैं वह पल भूल नहीं पाया जब बालक ने टूटे-फूटे शब्दों में अपनी कहानी बयान की थी।

सब कुछ सुनने के बाद में उसे निष्कर्ष पर पहुंचा था। की मार्त पिर्त उस बालक का बचपन संघर्ष से भरा हुआ था अकेला बच्चा अपना कहने वाला कोई नहीं। जो कुछ करना था उसका अपने निर्णय था। 
इसलिए 5 वर्षों का होते होते मनोहर बड़ा मेहनती बालक बन गया था मुझे आज भी याद है उस दिन बहुत तेज सर्दी थी शाम होते होते बाजार सूने हो गए थे दिनभर रजाई में दुबके रहने के बाद इच्छा हो गई टहलने की सर्दी से बचाव के लिए और ओवरकोट पहनना न जाने क्यों कदम मनोहर के घर की ओर चल पड़े।
क्या मनोहर कब है घर सचमुच का घर था चाय के ठेले के सामने दोस्ती के नीचे कोने पर दिए गए

 लोगों में स्कूल के सबको याद करता मनोहर दूर से ही दिखाई दे गया। 

श्री मशक्कत चेहरे पर थकान स्पष्ट नजर आ रही थी लेकिन आंखों में सुनहरे भविष्य का सपना चमक रहा था।
मनोहर क्या हो रहा है मेरी आवाज सुनते ही मन और उठ खड़ा हुआ शरीर पर सर्दी से बचाव की कोई उपाय न देख में विचलित हो उठा मनोहर ने शायद मेरे मन की थाह ले ली बोला आज सर्दी थोड़ी कम है बाबूजी फिर यह कंबल भी तो है मेरे पास आप चिंता ना करें।

मनोर के पास एक फटा कंबल था। 

अभी वह बच्चा हुआ था अधिक जरूरत हुई तो उसी को ओढ़ कर सो रहेगा मनोहर मैंने का मनोहर आगे चलकर तुम क्या बनना चाहोगे मनोहर बड़े विश्वास के साथ बोला बाबूजी में पढ़ लिखकर बहुत कुछ बनना चाहता हूं अभी मैं चाय के ठेले पर थोड़ी बहुत मेहनत करता हूं जब खर्चे के लिए मुझे मेरे मालिक पर्याप्त रुपए देता है वह मेरे लिए पिता तुल्य है।

सुबह शाम की मेहनत के साथ स्कूल की पढ़ाई भी मन लगाकर करता था।

मैं उस मनोहर की बात कर रहा हूं जो कभी यहां चाय के ठेले पर काम करता था। 

यह सुनकर युवक की आंखें चमक उठी बाबूजी कहीं आप वह तो नहीं जो वर्षों पहले यहां चाय पीने आते थे हां तुमने ठीक पहचाना तुम ही हो वह मनोहर। मनोहर ने झुककर मेरे पैर छू लिए मेरे लिए समझने को इतना ही प्रयोग था बचपन के मनोहर की विनम्रता आज और भी घनीभूत ही हो गई थी।
मुझे बीते समय की याद आने लगी तब मनोहर चाय की दुकान पर काम करता था गजब की फुर्ती थी

उसमें इस कार्य को करने के लिए किसी की बाध्यता नहीं थी। 

सुबह शाम की मेहनत के साथ स्कूल की पढ़ाई भी मन लगाकर करता था चाय की दुकान पर मेहनत से कमाया उसका पैसा स्कूल की फीस मैं चला जाता था बातों ही बातों में 1 दिन उसकी राम कहानी सुनने का अवसर मिला था उसने बताया था मैं अपने घर से भागकर यहां आया हूं यह पूछने पर कि तुम घर से क्यों भाग्य मनोहर ने जो कुछ बताया था वह एक अमिट छाप की तरह मेरे हृदय में अंकित हो गया।

बाबूजी अब उस घर में मेरा क्या रह गया था जो मैं वहां रहता तुम कहां के रहने 

वाले हो राजस्थान में डूंगरपुर के पास एक छोटे से गांव का तुम्हारा माता पिता कहां है एक माही तो थी मर गई कब कैसे बाबूजी तब मैं कोई 2 वर्ष का था बड़ी प्यारी थी मेरी मां बहुत प्यार करती थी मुझे।
बीमार हो गई थी बेचारी दवा के पैसे नहीं थे मेरे पास बस बिना किसी दवाई के लिए एक दिन मुझे छोड़ कर चली गई।
आज युवक मनोहर को देखकर मुझे बचपन का वह मनोहर याद आ गया जो मां की बात करते हुए फूट-फूटकर रो पड़ा था।

मनोहर में बिलासपुर की एक घनी बस्ती के बीच खड़ा था।

बहुत वर्षों बाद इस नगर में आने का अवसर मिला चारों और देखा 10 वर्ष में कितना परिवर्तन हो गया था

बस्ती के लोगों के चेहरे जाने पहचाने थे लेकिन समय की मार से वह चेहरे बुड्ढे हो गए थे।
मेरी निगाहें बस्ती के बीच चाय के ठेले को ढूंढ रही थी जो उन दिनों एक चाय की दुकान थी आज वह एक पक्का मकान बन चुका था हम कान के नीचे फुटपाथ से लगे एक छोटे से केबिन को देखकर मेरी दृष्टि एक पल के लिए ठिटकी।
हां वही चाय का ठेला आज साफ सुथरा केबिन बन गया था बिलासपुर छोड़ने के बाद में सब परिवार जन नगर के अपने पुश्तैनी घर में बस गया था।

आज इतने वर्षों बाद एक पारिवारिक समारोह में सम्मिलित होने आया था। 

न जाने क्यों बरसों पुराना चाय का ठेला मुझे बिलासपुर की पुरानी बस्ती में खींच लाया था कि बीन पर चाय बनाते एक युवक को देखकर मेरे पैर पर बस उसकी ओर बढ़ गए।
क्या तुम मनोहर नाम की किसी व्यक्ति को जानते हो युवक ने चाय को प्यालो में डालते हुए पूछा बाबूजी किसी मनोहर के लिए पूछ रहे हैं आप मुझे आवाज पहचानी सी लगी ध्यान से देख आयोग अपनी बस्ती में खोया

चाय बनाने में मशगूल था। 

चेहरा भोला भला आंखों में बचपन जैसे अभी भी झूल रहा था ललाट पर खींची रे कहीं चेहरे की मासूमियत के साथ मेले नहीं खा रही थी।
यह बता रही थी कि किसी कच्ची उम्र अनुभव और जीवन के थपेड़ों से गंभीर हो जाती है।
मनोहर का बचपन उसे फिर याद आ गया।

अंजू ने कहा लेकिन मिनी का ध्यान आते ही उसने अपने मुंह पर हाथ रख लिया।

यहां तो इसका कोई दोस्त भी नहीं बनेगा क्योंकि यह लंगडी हो गई है सभी जने बत्तख की बात कर रहे थे। 

 मैं उसके पैर और पंखों दवाई लगा कर ठीक कर दूंगी ठीक होते ही देखना ही फिर से उड़ सकेगी मिनी ने कहा सभी बच्चों ने हमें अपनी गर्दन हिलाई धीरे-धीरे बच्चे मिनी के दोस्त बन गए कुछ दिन बाद शैली बिल्कुल ठीक हो गई एक कमरे से दूसरे कमरे में उड़ती रहती थी एक दिन मिनी के पिताजी मिनी और बच्चों को नहर के पास वाले पार्क में ले गए।
शैली को भी साथ लेकर गेम शैली को नहर में तैरने के लिए उतारा वे धीरे-धीरे तेल में लगी और फिर पंख फड़फड़ा ते पानी में उछलने लगी बच्चे बहुत दूर तक उसे तैरते हुए देख रहे वे तेरे ते तेरे ते दूर निकल गई।

मिनी और बच्चे सेलीको टाटा बाय-बाय कह कर अपने घर लौट आए। 

सभी को शाम बच्चे अपने घर लौट आए।
मिनी उदास बैठी थी बच्चे भी खेलने नहीं आए थे तभी दरवाजे की घंटी बजी सारे बच्चे वहां खड़े थे अंजू ने कहा आंटी मिनी को हमारे साथ खेलने भेज दीजिए। हम उसे बहुत संभाल कर ले जायेंगे हम सब उसका ध्यान रखेंगे बंटी बोलना मिनी को अब बहुत से मित्र मिल गए थे

 अब मिनी उदास और अकेली नहीं रहेगी। 

वह धीरे-धीरे जो मिनी ने अपने पांव और हाथ की कमजोरी खाई थी वह उन बच्चों के साथ खेलते खेलते वापस मिल गई और मिनी आज बहुत खुश है उसने भी अपने दोस्तों के साथ खेलना शुरू कर दिया और वह भी स्कूल जाने लग गई और उस टायर वाली साइकिल को छोड़ दिया आज मिनी बहुत खुश है।

दूध पीते ही उसकी आंखें चमकने लगी।

अबू पंख फैलाकर मिनी की गोद में लेट गई मां यह मेरी सहेली है मैं इसका नाम सहेली रखूंगी मिनी ने कहा मां मुस्कुरा दी। 

रात होने पर उसके पिताजी ने पूछा मीनिंग की सहेली कहां सोएगी यह मेरे पास मिनी ने अपने पलंग की तरफ इशारा करते हुए का शैली को एक कटोरी में सूखी घास रखकर सुला दिया गया।
सुबह उठकर मैंने देखा तो टोकरी खा ली थी वह जोर से पुकारने लगी सहेली सहेली तभी देखी की सहेली बाथरूम के दरवाजे के पास भीगी हुई झांक रही थी यह देखकर मिनी हंसने लगी मिनी उसके पास जैसे ही गई वह पंख फड़फड़ा कर दूर जा खड़ी हुई यूं ही दोनों एक दूसरे के साथ कुछ देर तक खेलती रही तभी मां कमरे में आई और कहां चलो मिनी तुम्हारा और तुम्हारी सहेली का नाश्ता तैयार है।

मां पहले शैली को खिला दूं फिर खुद खाऊंगी मिनी ने कहा। 

तभी दरवाजे की घंटी बजी कई बच्चे वहां खड़े थे उन्होंने पूछा आंटी क्या हम बत्तख को देख ले हां हां आओ यह देखो।
मिनी बत्तख को लिए ड्रॉपर पर से दूध पिला रही थी सभी बच्चे ने उसे छू छू कर देखा और अपनी स्कूल जाते जाते थे गई मिनी हम सब स्कूल से लौटकर फिर आएंगे मिनी ने भी नाश्ता किया और शैली को कटोरी में लिटा कर अपने स्कूल के लिए तैयार हो चली गई शाम को बच्चे मिनी के घर आए

बंटी बोला इससे बेचारी शैली के साथ तो बहुत दूर उड़ गए होंगे। 

वह सभी बच्चों ने इस बच्चे के लिए अपना अपना दुख जताया और सभी कहने लगे इसके साथ ही तो बहुत दूर चले गए होंगे अब इसका क्या होगा बेचारी का और सहेली ने उसका नाम मीनिंग के साथ रख दिया और दोनों ही साथ में मस्त रहने लगे।

मिनी ने गेंद को बच्चों को खेलने के लिए दे दिया।

पहले तुम मिनी घबरा गई। 

फिर उसने हिम्मत करके देखा तो वह चीज गेंद नहीं एक पक्षी था डर के कारण वह पक्षी मिनी की गोद में डूबता हुआ था अचानक बारिश की बूंद तेजी से गिरने लगी मामा जल्दी आओ मिनी ने मां को पुकारा क्या बात है मिनी मां ने कहा देखो मां आसमान से यह पक्षी गिरा है मिनी को पक्षी दिखाते हुए बोली।
मान्य बताएं मिनी यह बत्तख है सूअर प्रजाति की बत्तख।
यह उन प्रवासी पक्षियों में से एक है जो हजारों किलोमीटर दूर उत्तर की और बर्फ पानी प्रदेशों में रहते हैं।

जब सर्दी और ज्यादा बढ़ जाती है तो वे दक्षिण की ओर गर्म प्रदेशों में उड़ जाते हैं जाट के मौसम में यहीं रहते हैं और गर्मियों शुरू होते ही वापस लौट जाते हैं। 

लगता है बहुत थक गई है यह मम्मी ने कहा।
हां ऐसा लगता है कि अपने घर लौटते वक्त अपने जून से बिछड़ गई है।
अपने बाकी साथियों को खोजने के लिए ज्यादा उड़ान भरने की वजह से थक गई और ऐसे में पंक कहीं टकरा गए जिससे गईल हो गई है मां कहा।
हां मां ऐसा ही लगता है मिनी ने कहा मां ने जैसे ही पक्षी को उठाना चाहता है लड़खड़ आती हुई

 अंदर वाले कमरे में चली गई और एक कोने में लटक कर आपने लगी।

मिनी और मैंने उसे खिलाने की बहुत कोशिश की पर उसने कुछ भी नहीं खाया मां शायद यह दूध चावल खा ले मिनी बोली।
माननीय मिनी के के अनुसार ही चावल और दूध मिलाकर एक कटोरी में रखा पर बत्तख ने उसे मुंह भी नहीं लगाया तब मिनी ने उसे गोद में बिठाकर ऊपर से दूध पिलाया।

सहेली मार्च का महीना था।

पतझड़ का मौसम होने की वजह से पेड़ों से पीली पत्तियां के साथ पतली पतली शाखाएं भी टूट रही थी। 

शाम को मौसम ठंडा हो जाता तुम मिनी अपनी पहिए वाली खुशी को बालकनी में ले आती बाहर है वर्ष की मिनी के हाथ पैर कमजोर थे।
इसलिए खेल नहीं सकती थी बस कुर्सी पर बैठ खेलते बच्चों को निहारती रहती 1 दिन में बालकनी में बैठी बच्चों को खेलते देख रही थी तभी उसकी मां ने पुकारा मिनी अंदर आ जाओ ना 1 मिनट रुक जाओ मां मिनी ने कहा वह बच्चों का एक बड़ी सी लाल गेंद को उछाल उछाल कर खेलना देख रही थी तभी माने कामिनी अगर बारिश हो तो अंदर आ जाना भीगना मत।

मिनी को प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के लिए खास प्रकार के स्कूल में भेजा जाता था

 इस स्कूल में उसे पढ़ाई के साथ तरह-तरह के व्यायाम और बोलना भी शिकायत जाता था जिससे उसे काफी फायदा भी हुआ और वह धीरे धीरे चलने के साथ हाथों से पेन दृश्य चम्मच पकड़ने की गई थी।
यह वाली कुर्सी से वह घर में यहां आ जाया करती थी हांलाकि सुबह पापा स्कूल छोड़ आया करते थे

 वह शाम को मम्मी जाकर ले आती थी मिनी के परिवार को इस कॉलोनी में आए हुए 6 माह हो गए थे। 

उससे किसी की दोस्ती नहीं हुई थी बच्चे अभी भी पार्क में खेल ही रहे थे कि बारिश शुरू होगी पर गुंडों की परवाह किए बगैर ही बच्चे खेलने में मस्त है।
तभी अचानक एक भूरे रंग की गेम से कोई चीज नीचे गिरी बच्चे हो उसके आसपास जमा होगी और उसे गौर से देखने लगे वह छोटी सी वस्तु पंख फड़फड़ा ते हुई मिनी की गेम में आकर गिर गई।
आगे की सहेली पार्ट में देखेंगे।